सर्वोच्च नागरिक सम्मान पर राजनीति क्यों? इससे सम्मान की गरिमा कम होने के साथ विश्व में धारणा बनती है कि हम भारत रत्न’ भी आम राय से नहीं चुन सकते

भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान फिर विवादों में है।

70वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर इस बार तीन
विभूतियों को ‘भारत रत्न’ से नवाजने की घोषणा की
गई। प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे नानाजी देशमुखमशहूर लोक गायक व संगीतज्ञ असम के भूपेन हजारिका तथा पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को यह सम्मान दिया गया। देशमुख और हजारिका को मरणोपरांत सर्वोच्च सम्मान मिला है। इसके साथ ही 112 पद्म सम्मान की भी घोषणा की गईप्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति की ओर से अधिकतम तीन हस्तियों को ‘भारत रत्न’ दिए जाने का ऐलान किया जाता है। शुरू में तो नहीं
लेकिन बाद में सर्वोच्च सम्मान को भी लेकर राजनीति होने लगी। जिस दल या गठबंधन की सरकार केन्द्र में बनीउसके द्वारा घोषित पुरस्कारों पर विपक्ष ने विरोध जताना शुरू कर दियाफिर चाहे वह सचिन तेंदुलकर हों, लता मंगेशकर या राजीव गांधी। सचिन के क्रिकेट से संन्यास लेते ही यूपीए सरकार ने उन्हें भारत रत्न देने की घोषणा की थी, तब खेल और राजनीति से जुड़े लोगों ने जमकर विरोध किया।उनका कहना था कि भारत को ऑलम्पिक और विश्व कप में स्वर्ण पदक दिलाने वाले विख्यात हॉकी खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद को दरकिनार कर कैसे यह सम्मान दिया जा सकता है।
अब की बार प्रणव मुखर्जी और भूपेन हजारिका को लेकर
सवाल उठ रहे हैं। बेशक प्रणव दा का भारतीय राजनीति में एक अर्थशास्त्री और कुशल नीतिनिर्माता के रूप में बड़ा योगदान रहा। है। विपक्षी यह कहकर सवाल उठा रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में चुनावी फायदा उठाने के लिए और प्रणब के पिछले दिनों संघ के सम्मेलन में जाने के कारण उन्हें यह सम्मान दिया गया है। वहीं हजारिका के निधन से कुछ समय पूर्व भाजपा में शामिल होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। बाबा रामदेव ने तो अभी तक किसी संत को भारत रत्न नहीं दिए जाने पर नाराजगी जताई है। कांग्रेस के
मल्लिकार्जुन खड़गे की मांग थी कि कर्नाटक के लिंगायत संत शिवकुमार स्वामी को यह सम्मान दिया जाना चाहिए था शिवकुमार स्वामी का हाल ही निधन हुआ है। असम के गायक जुबिन गर्ग की ‘भारत रत्न’ सम्मान के खिलाफ कथित टिप्पणी को लेकर तो उनके खिलाफ एफआइआर दर्ज की गई है। प्रख्यात लेखिका गीता मेहता को साधुवाद। उन्होंने यह कहते हुए पद्मश्री लेने से इनकार कर दिया।
कि उनके भाई नवीन पटनायक ओडिशा के मुख्यमंत्री हैं। चुनावी वर्ष में सम्मान से फर्क पड़ सकता है। सवाल उठता है कि आखिर देश के इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान पर राजनीति क्यों की जाती है। इससे इस सम्मान की गरिमा कम होने के साथ विश्व में धारणा बनती है कि हम ‘भारत रत्न’ भी आम राय से नहीं चुन सकते। देश में विशिष्ट श्रेणी क्रम में यह सम्मान सातवें स्थान पर आता है। तो फिर क्यों न इनका चयन भी विवाद रहित हो। सरकार नीति बदले ताकि
ऐसी चयन समिति बने जिसमें प्रधानमंत्रीविपक्ष के नेता के साथ ही विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियां शामिल हों। पारदर्शी और निष्पक्ष व्यवस्था से विवाद की संभावना नहीं रहेगी। आखिर भारत रत्न हमारे देश की शान है, उस पर किसी प्रकार का विवाद राष्ट्रहित में नहीं होगा।

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